That childhood day - वो बचपन के दिन - Hindi Poem
वो बचपन के दिन भी क्या दिन थे.
ना गम था ना खुशी थी,
बस मगन अपना दिल था,
वो मस्ती भरे खेलते दिन,
वो आँखों में सोती रातें,
ना घबराहट, ना बेचैनी,
ना थकान का बोझ,
ना आशा, ना अभिलाषा,
ना ईर्ष्या ना कोई द्वेष, ना अमीरी ना गरीबी,
बस पंछियों की तरह उड़ना और चहकना,
वो दिन भी कितने उमंग भरे और हसीन थे,
वो बचपन के दिन भी क्या दिन थे।
ना दुनियादारी, ना बेशुमारी,
ना किसी से जीतने की होड़,
ना यादों का बोझ,
ना दोस्ती ना दुश्मनी,
ना कोई चाह ना कोई लालसा,
ना रिश्तों की समझ, ना उसूलों की परख,
बस था तो अपना वो मासूम और आवारा दिल,
जिसे जहाँ भी ले चलो वहाँ चला गया,
वो हृदय की कोमलता,सरलता और निश्छलता,
थी कितनी भी कठिनाई,पर इन सब बातों से अनजान,
दिल अपना शहंशाह था,
वो दिन भी कितने खूबसूरत और सुकून भरे दिन थे,
वो बचपन के दिन भी क्या दिन थे।
ना किसी से जीतने की होड़,
ना यादों का बोझ,
ना दोस्ती ना दुश्मनी,
ना कोई चाह ना कोई लालसा,
ना रिश्तों की समझ, ना उसूलों की परख,
बस था तो अपना वो मासूम और आवारा दिल,
जिसे जहाँ भी ले चलो वहाँ चला गया,
वो हृदय की कोमलता,सरलता और निश्छलता,
थी कितनी भी कठिनाई,पर इन सब बातों से अनजान,
दिल अपना शहंशाह था,
वो दिन भी कितने खूबसूरत और सुकून भरे दिन थे,
वो बचपन के दिन भी क्या दिन थे।
वो बच्चों की टोली,जो लगती थी हमजोली। वो लड़ाई में भी प्यार,वो प्यार में भी तकरार। वो शाम का खेल और बच्चों की रेल। वो मिठाई के हिस्से,और बाबा के किस्से। बेवजह पागलों की तरह हँसना,बिना वजह रोना। ना किसी को खोने का डर,ना पाने की बेचैनी। वो तितलियों के पीछे - पीछे घंटों भागना। बालू और ईंट से घरौंदे को बनाना। कुछ भी ना सोचने ना समझने में समय बिताना।वो दिन भी कितने नादान और बेतुकी सवालों से भरे दिन थे। वो बचपन के दिन भी क्या दिन थे।
बस यूँ हीं बचपन बीत गया अल्हड़ मौज - मस्ती में, कागज की कश्ती में, अपनी वो कच्ची सी बस्ती में। वो मिट्टी के आंगन में,वो मां के आँचल के दामन में। वो पेड़ों की छाँव में,वो बारिश की नाव में। वो दुनिया के दाँव - पेंच से दूर दिन भी कितने रंगीन थे। वो बचपन के दिन भी क्या दिन थे।
हे ईश्वर ! मेरी इल्तज़ा है आपसे, मुझे वहीं ले चल,जिस पल में मेरा हसीन बचपन बीता था। वो बचपन का अनमोल दौलत, वो अपनो का शोहरत मुझे लौटा दे। वो खुशियों का खजाना, वही सोच का पैमाना मुझे लौटा दे।
वो बचपन की यादें जाती नहीं,और बचपन है कि आती नहीं। ढ़ूँढ़ती फिरती हूँ मैं अपने बचपन को दुनिया के शोर - शराबे में, ढोल - नगाड़े में , गीतों में, गुलज़ारों में। दिल के वीरानो में, रात के अंधेरों में, दिन के उजालों में।
अफसोस! फिर मुझे याद आता है,तब सोचती हूँ,जो दिन चले जाते हैं, वो वापस कभी नहीं आते, कभी नहीं! कभी नहीं!
Supriya Bharti

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