Jawani ki dahleez par- जवानी की दहलीज पर - Hindi poem
Jawani ki dahleez par- जवानी की दहलीज पर - Hindi poem
दिल को पागल बनाने, लेकर एक कहानी आई।
सुबह बीती,शाम गुजरी,
आँखों से नींद उड़ाने, रात सुहानी आई,
दिल को पागल बनाने, लेकर एक कहानी आई।
कुछ उलझनें,कुछ मुश्किलें,कुछ रुसवाई, कुछ तन्हाई,
पलकों पे ख्वाब लिए, ऐसी एक जिंदगानी आई,
दिल को पागल बनाने, लेकर एक कहानी आई।
कुछ मुस्कुराने, कुछ बेचैनियों को बढ़ाने,
कुछ अनकही बातें बताने, कुछ सूनेपन को सताने,
आँखों में कैद, वो तस्वीर पुरानी आई,
दिल को पागल बनाने ,लेकर एक कहानी आई।
खुद में खो जाने, दिल को गुदगुदाने,
किसी हसीन चेहरे पर ठहर जाने और,
उसे हमसफ़र बनाने की रुत रूहानी आई,
दिल को पागल बनाने, लेकर एक कहानी आई।
गमों को छुपाने, दूरियों को बढ़ाने,
ज़मीर को जगाने, जिम्मेदारियों को समझाने,
कोई राह अन्जानी आई।
दिल को पागल बनाने, लेकर एक कहानी आई।
अब देखना है यारों!
कौन इसमें कितना जीता है,
कौन मर जाता है,
कौन थककर पीछे हट जाता है,
कौन इसे बखूबी समझता है,
और कौन इस जंग में ठहरता है,
कौन इससे जीतता है,
और कौन हार जाता है,
इन्हीं बातों का सबब बताने,
फिर से एक बार ये दौर दुहराने आई,
बचपन बीता, जवानी आई
दिल को पागल बनाने, लेकर एक कहानी आई।
- Supriya Bharti

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