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Delhi Gas Chamber - दिल्ली गैस चेंबर - Hindi poem

delhi gas chamber - दिल्ली गैस चेंबर - hindi poem
श्वेत थी कभी वो आंखें लाल हुई,
विषाक्त रसायन की जलन उनमें समाई हुई,
रफ्तार जिंदगी की पड़ गई मन्द जैसे,
दिल्ली की श्वास नलिका में रूकावट आई।

निरोगी थी कभी, अब वो रोगों से घिरी हुई,
परेशान है आमजन; जनता है डरी हुई,
प्रदूषित भोर यहां संध्या है जहरीली जैसे,
मास्क लोगों के मुंह पर लेकिन सरकार की जिह्वा कटी हुई।

कारखानों का काला धुआं मंत्रियों के वादों पर पुत गया,
कुशल इनकी हर व्यवस्था का कच्चा चिट्ठा खुल गया,
बाहर कदम रखना भी हर शख्स का हो गया दूभर जैसे,
याद रही कुर्सी की गद्दी लेकिन उसके पैरों को भूल गया।

बच्चे,युवा और बुजुर्ग;सभी को विपदाओं ने घेरा है,
तोड़ो लेकिन चिरनिद्रा अब; भले विषैले मेघों का बाहर पहरा है,
कोसना बंद करो; स्वयं इस संकट से उभरो जैसे,
जिम्मेदारियों को समझो अपनी; जागो तभी सवेरा है।

कूड़ा,कचरा,गंदगी यूँ ही सड़कों पर ना डालो तुम,
ईंधन से बेहतर है बैटरी वाहन संभालो तुम,
दहकाओ मत पराली को;उपकरणों से मूल समेत उखाड़ो जैसे,
प्रदूषण मुक्त करो शहर अपना;स्वस्थ जीवन को अपनालो तुम।

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