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तुम्हीं बता दो - tum hi bata do - hindi poem

tum hi bata do - hindi poem - kuchlikha.com
tum hi bata do - Hindi Poem - kuchlikha.com

कितना और कब तक तुम्हे आज़माऊँ तुम्ही बता दो

हमेशा तो झुकाया है सर तुम्हारी ही खिदमत में,
क्या खुद भी टूट कर बिखर जाऊँ तुम्ही बता दो।


इत्मिनान कब होगा तुम्हे मेरी बातों पे मेरे हमदम,
क्या सदा के लिए खामोश हो जाऊँ तुम्ही बता दो।



आफताब सी लगने लगी है मुझे तुम्हारी मोहब्बत,
क्या धरती सा मैं भी बन जाऊ तुम्ही बता दो।


शख्सियत मेरी गर चुभती हो तो बताओ बेहिचक,
क्या अपनी शोहरत भी गवां दू तुम्ही बता दो।


कुछ भी और कोई भी याद नहीं मुझे तेरे सिवा,
क्या तुझको भी भूल जाऊँ तुम्ही बता दो।


हर जतन किया है तुझे पाने का मैंने जाना,
और कैसे ये रिश्ता कैसे निभाऊँ तुम्ही बता दो।


सब्र नहीं तुमको मंजिल तक पहुंचने तक का भी,
कैसे मै कदम से कदम मिलाऊँ तुम्ही बता दो।


तुम तो बैठे हो सब गवाकर एक हारे हुए मांझी की तरह,
कैसे मैं यूँ खुद को जिताऊँ तुम्ही बता दो।


तुम्हे तो फर्क नहीं है मेरे होने न होने का भी,
मैं तुमसे कैसे अचानक दूर हो जाऊँ तुम्ही बता दो।


इतने कैसे बेफिक्रे हो गए हो तुम ऐवी ही,
अब तुम्हारे बिना जीवन कैसे बिताऊँ तुम्ही बता दो।


बेवजह ही तुमने छोड़ा है मुझे और मेरी मोहब्बत को,
मैं कैसे इस कमबख्त दिल को समझाऊँ तुम्ही बत दो।

- रश्मि शुक्ला

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