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Pilgrim of mankind - मानव तीर्थ - hindi poem - kuchlikha

Pilgrim of mankind - मानव तीर्थ - hindi poem - kuchlikha
Manav Teerth - Hindi Poem - kuchlikha.com
तुम धर्म जाति की बात करो
मैं इंसा होने की शर्त लगाता हूँ
तुम ख्वाहिश रखो सत्ता की 
मैं रोटी की खोज में जाता हूँ
तुम नीति नियम की बात करो
मैं उजड़ों की बस्ती बसाता हूँ
तुम निंदा कटाक्ष के वचन बुनो 
मैं पीड़ा के दंश मिटाता हूँ
मन्दिर मस्जिद की बात करो 
मैं मानव का तीर्थ बताता हूँ
तुम अधिकारों का मार्ग रचो
मैं कर्तव्य पथ में जाता हूँ
तुम सागर सा खारा बन जाओ
मैं नीर नदी का बन जाता हूँ
तुम व्यापारी सा बन जाओ
मैं कृषक बन अन्न उगाता हूँ
तुम जज बनकर न्याय करो
मैं गीता पर हाथ रख कसम खाता हूँ.

- Sweta Pandey

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