Drying River - सूखती नदी - hindi poem
"सूखती नदी"
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| Sukhati Nadi - सूखती नदी - Hindi Poem |
एक प्रेम कहानी अजब सी देखी
सरिता और सागर की
वो इठलाती सी
शर्माती सी
बहकी बहकी फिरती सी
नहीं है धीरज क्षण भर का भी
मिलने अपने सागर से
निरंतर ज्यों सा बहती सी
सागर अक्षम बहने में
सो राह तके वो प्रिया का
गहरा शांत वो ठहरा है
बूंद बूंद में धैर्य भरा है
रोज़ वो मिलने आती उससे
आलिंगन होता आत्माओं का
बांटती वो गम का खारापन
अपने निर्मल तन मन में
वो भी खुशी में नृत्य सा करता
प्रिया के आगमन में
दोनों मिलते
दोनों घुलते
एक दूजे से जुड़े अटूट
सदियाँ बीतीं युग ही बीते
इस प्रेम में ना अंतर आया
पर प्रेम कहाँ सह पाई कुदरत
देख ये निश्छल निर्मल प्रेम
खौल उठा उसका कण-कण
फिर उसने तप्त वार चलाया
वार ये कैसे सह पाती सरिता
अन्तर्मन अब लूट चुका
सागर अडिग सा खड़ा रहा
और विरह में सूख चुकी सरिता
न इठलाती वो
न शर्माती वो
न बहकी बहकी जाती वो
बस हाथ पसारे रहती सरिता
आह !! विरह में सूख चुकी सरिता
- शिवानी लवानिया

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