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Song of courage - साहस गान - hindi poem

Song of courage - साहस गान - #hindipoem #shivanilawaniya

Song of courage - साहस गान - hindi poem - kuchlikha.com

तृषा लिए हो उच्च शिखर की, 
क्यूँ धरा में कदर्य फिरते हो? 
मन कोष भरो क्षत्र भाव से, 
क्यूँ विचार कराल से डरते हो? 

अंतर्मन अवगाह में झांको, 
खोजो साहसी शायक को। 
वहीं मिलेगा लहू-लौह सा, 
पारित उससे सैलाब करो। 
क्यूँ प्लावित हुए यूँ मरते हो? 
तृषा लिए हो उच्च शिखर की, 
क्यूँ धरा में कदर्य फिरते हो? 

जीवन वन को जीवन  दो, 
रक्त से सींचो पल्लव पल्लव। 
यौवन-सूर्य प्रकाश लिए तुम, 
भीतर निरा ब्रह्माण्ड लिए हो। 
क्यूँ अज्ञान हुए यूँ फिरते हो? 
तृषा लिए हो उच्च शिखर की, 
क्यूँ धरा में कदर्य फिरते हो? 

शव-ह्रदय न रखो सीने में, 
भय पर प्रखर प्रहार करो। 
शरासन पर चढ़ा प्रत्यंचा, 
दूर लक्ष्य संधार करो। 
क्यूँ सीमित वृत्त में घिरते हो? 
तृषा लिए हो उच्च शिखर की, 
क्यूँ धरा में कदर्य फिरते हो? 

कनकाभ सा आनन विजय ही देती, 
विनत हुए क्या कुछ है मिला ?
निर्वाक अथक परिश्रम से ही, 
विजय का हर पुष्प खिला। 
क्यूँ निरीह पथिक यूँ बढ़ते हो? 
तृषा लिए हो उच्च शिखर की, 
क्यूँ धरा में कदर्य फिरते हो?

तृषा- इच्छा | कदर्य- कायर | क्षत्र- बल | कराल- डरावना
अवगाह- गहराई | शरासन- धनुष | कनकाभ- सोने की चमक समान
आनन- मुख | विनत- झुका हुआ | निरीह- उदासीन, विरक्त 

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