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Finally - आखिरकार - hindi poem

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Finally - आखिरकार - hindi poem - kuchlikha.com

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तीर-ए-नूर-ए-सितारा आज आसमान की तरकश में नहीं है
और शमा हम जलायेंगे नहीं, कि कहीं पतंगा कोई जल ना जाये
'चाँद' जिसे हम अपना सबसे अच्छा शागिर्द समझते है, जिसे हम अपनी ज़िंदगी पढ़ाते है
आज वो भी अमावस की अर्जी देकर छुट्टी ले गया है
आज हम किसको पढ़ाये, किससे बात करें?? 
हमने फैसला किया है
कि आज हम सियाह मौसम की पट्टी पर दिल की चॉक से लिखेंगें
आज हम पर बरसात नहीं होगी, हाँ मगर बेहिसाब बादल जरूर मंडराएँगे
तब हम लिखेंगे कि 
थकी ज़मीन पर जब अँधेरा हो रहा था
दो घूँट समन्दर आँखों से बहाने का जब मन हो रहा था
एक तूफान की दहाड़ से,जब ज़िन्दगी डरने लगी थी
सन्नाटों में पेड़ो की आवाज, जब खौफ़ पैदा करने लगी थी
दिल में रहे दोस्त जब गुम हो चुके थे
जेबों में रखे सारे मनोबल जब टूट चुके थे
हम हारकर घुटनो के बल जब बैठ चुके थे
खुदा को खुद से ज्यादा जब याद कर चुके थे
अपने गुनाहों के हिसाब से जब सजा ज्यादा लगी थी
माँ के आँचल की जब ज़ोरो से प्यास लगी थी
उस वक़्त कुछ देर
हम धड़कने थामकर, हौंसला बाँधकर, मुस्कुरा दिये
पिताजी की छड़ी आसमान को दिखा दिये
एक बर्क़ तब आसमान से चमक गई
अँधेरे की सभा पल में ही बिखर गई
हमें फिर से जुनून आ गया
फिर एक सितारा नज़र आ गया


©I A M A N K Y T

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