Yaadon ki dahshat- यादों की दहशत - Hindi poem
यादों का क्या करूँ, बदलूँ कैसे इनकी फितरत
ऐ ख़ुदा! तू ही दे बता,
कुछ यादों को कैसे करूँ रुखसत।
नहीं चाहिए हमें इनका साथ,
जो देतीं हैं हमेशा मेरे दिल को मात।
ये कुबूल करतीं नहीं अपनी गलती,
और देती रहती हैं कसक हल्की।
बड़ी बेरहम है ये यादों की हसरत,
ऐ ख़ुदा! तू ही दे बता,
कुछ यादों को कैसे करूँ रुखसत।
यूँ तो जिसे चाहो,वो चाहता नहीं,
जिसे माँगो,वो मिलता नहीं,
जिसे दिल में बसाओ,वो ठहरता नहीं,
जिसे पूजो, वो दिखता नहीं।
पर ये यादों का कारवाँ ऐसे निकलता है,
जैसे बिन घटा के बरसात हो,
बिन धुएँ के आग हो,
बिन गीत के राग हो,
बिन जीत के हार हो।
बिन माँगे हीं ये हमपे,
बरसा देतीं हैं अपनी रहमत
ऐ ख़ुदा! तू ही दे बता,
कुछ यादों को कैसे करूँ रुखसत।
यादों की ऊँचाइयों से हम अब तक रहे अनजान
ये इतनी ऊँची भी जाती हैं,
और फाड़ सकती हैं आसमान।
बड़ी बेख़ौफ़ होती हैं ये यादें,
बड़ी नासूर होती हैं ये यादें।
ये डरती नहीं अँधेरे से,
ये रुकती नहीं किसी घेरे से।
ये गिरती नहीं फिज़ाओं से,
ये बुझती नहीं हवाओं से,
और ये मरती नहीं आत्माओं से।
इन्हें दर्द होता नहीं किसी के दर्द से,
इन्हें फर्क पड़ता नहीं,किसी की कसक से,
इन्हें दया आती नहीं,किसी की तड़प से।
यादें होती ही हैं,ऐसी बेदर्द सी,
यादें होती ही हैं,ऐसी ख़ुदग़र्ज़ सी।
यादों की परिभाषा अब तक ना समझ पाई हूँ,
कि क्या है इनका फितूर!
बस जान पाई हू्ँ,
यादें, यादें और यादें!
यही है यादों का दस्तूर।
यादें तो रहेंगी,जब तक है,यादों की दहशत।
यादों का क्या करूँ, बदलूँ कैसे इनकी फितरत
ऐ ख़ुदा! तू ही दे बता,
कुछ यादों को कैसे करूँ रुखसत।
~supriya bharti
ऐ ख़ुदा! तू ही दे बता,
कुछ यादों को कैसे करूँ रुखसत।
नहीं चाहिए हमें इनका साथ,
जो देतीं हैं हमेशा मेरे दिल को मात।
ये कुबूल करतीं नहीं अपनी गलती,
और देती रहती हैं कसक हल्की।
बड़ी बेरहम है ये यादों की हसरत,
ऐ ख़ुदा! तू ही दे बता,
कुछ यादों को कैसे करूँ रुखसत।
यूँ तो जिसे चाहो,वो चाहता नहीं,
जिसे माँगो,वो मिलता नहीं,
जिसे दिल में बसाओ,वो ठहरता नहीं,
जिसे पूजो, वो दिखता नहीं।
पर ये यादों का कारवाँ ऐसे निकलता है,
जैसे बिन घटा के बरसात हो,
बिन धुएँ के आग हो,
बिन गीत के राग हो,
बिन जीत के हार हो।
बिन माँगे हीं ये हमपे,
बरसा देतीं हैं अपनी रहमत
ऐ ख़ुदा! तू ही दे बता,
कुछ यादों को कैसे करूँ रुखसत।
यादों की ऊँचाइयों से हम अब तक रहे अनजान
ये इतनी ऊँची भी जाती हैं,
और फाड़ सकती हैं आसमान।
बड़ी बेख़ौफ़ होती हैं ये यादें,
बड़ी नासूर होती हैं ये यादें।
ये डरती नहीं अँधेरे से,
ये रुकती नहीं किसी घेरे से।
ये गिरती नहीं फिज़ाओं से,
ये बुझती नहीं हवाओं से,
और ये मरती नहीं आत्माओं से।
इन्हें दर्द होता नहीं किसी के दर्द से,
इन्हें फर्क पड़ता नहीं,किसी की कसक से,
इन्हें दया आती नहीं,किसी की तड़प से।
यादें होती ही हैं,ऐसी बेदर्द सी,
यादें होती ही हैं,ऐसी ख़ुदग़र्ज़ सी।
यादों की परिभाषा अब तक ना समझ पाई हूँ,
कि क्या है इनका फितूर!
बस जान पाई हू्ँ,
यादें, यादें और यादें!
यही है यादों का दस्तूर।
यादें तो रहेंगी,जब तक है,यादों की दहशत।
यादों का क्या करूँ, बदलूँ कैसे इनकी फितरत
ऐ ख़ुदा! तू ही दे बता,
कुछ यादों को कैसे करूँ रुखसत।
~supriya bharti
कोई टिप्पणी नहीं: