झूठा वजूद - Jhootha Vajood - hindi series - part 2
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| झूठा वजूद - Jhootha Vajood - hindi series - part 2 |
कुछ लोग होते है जिन्हें आईने के सामने खड़े होकर खुद के ही जवाब नहीं मिलते। वो बस अजनबियों से अपनी तारीफ सुनना चाहते है और तारीफ भी कौनसी (हीरो वाली), ये सुनने के लिये पागल रहते है, और अपनी आधी से ज्यादा ज़िन्दगी इसी के लिये गुज़ार देते है। इस बीमारी से ग्रस्त एक मेरा मित्र जो अजीब सी झूठी विविधताओं में फँसा रहता है, झूठी विविधताओं से मतलब कि वो विचार जिसमें हुस्न पर ज़रिकोटे का काम किया जाता है, औरों को लुभाने के लिये। वो उनमें से एक है जिन्हें असली सितारों से ज्यादा किसी के सिर पर लगे नक़ली सितारों से आकर्षण होता है। रोज़ की तरह फिर शाम को हम साथ बैठे बैठे चाय पी रहे थे, और वो खोया हुआ था किसी सोच में जैसे कि हमेशा रहता था और मैं इंतज़ार कर रहा था उसकी उन तकलीफों को सुनने का। अंदर से ये इतना भरा हुआ रहता है कि पूरी शाम और रात भी गुज़र जाये तो इसकी परेशानियाँ सुनाना बन्द ना हो, पर मुझे भी आदत हो चुकी थी सुनने की। चाय के पहले सिप के साथ ही उसने कहा, यार ज़िन्दगी में खुशी कब आयेगी। वही पुराना सवाल, ज़िन्दगी में खुशी से मतलब इसका सिर्फ इतना था कि कब इसे इसकी प्रेमिका मिलेगी और लोग कब इसकी तारीफ करने लगेंगे। अपने इसी सपने के लिये आज भी इसने अपनी वेशभूषा का हुलिया कुछ अलग रखा था, फिल्मी सितारों का भूत ऐसा चढ़ा हुआ है कि इसे लगता है अगर ये अजीब और अनाड़ी फैशन ना करें तो लोग इसे देहात का समझेंगे, लड़कियाँ इसे पसन्द नहीं करेगी। मुझे भी उसकी इस सोच से कोई तकलीफ नहीं आखिर जवानी में बुद्धि का फिरना आम बात है। बस तक़लीफ़ होती है तो इस बात की, अगर कुछ पहनना है अच्छा दिखने के लिये तो उसे एक अटूट विश्वास से पहनो और अपने ज़ेहन के आराम का भी ध्यान रखो। अपने किसी एक पैर की पतलून एक बिलांग छोटी करके वो बैठा था टूटते विश्वास का चाय का प्याला हाथ में लिये। वो लोगो के चेहरे देख रहा था कि उसे देखकर कहीं लोग हँस तो नहीं रहे, और मुझसे उम्मीद कर रहा था कि मैं उसके इस पहनावे पर कुछ बोलूँ। मगर मैं भी उसका सब्र देख रहा था, कि भला कब तक ये बिना पूछे रह सकता है। आखिर वो पूछ ही देता है, भाई ज्यादा अजीब तो नहीं लग रहा है ना ये पहनावा?
मैंने भी पूछा कि इसकी वजह क्या है।
वो कहने लगा, बस ऐसे ही कुछ अच्छा पहनने की इच्छा हुई तो पहन लिया।
उसका आत्मविश्वास बढ़ाने के लिये मैंने भी सीधे से कह दिया, "अच्छा पहनने की इच्छा थी तो अच्छा ही पहना होगा" इसमें इतना घबराने की क्या बात है।
वो कहने लगा, नहीं यार बस ऐसे ही लोग अजीब निगाहों से देख रहे है इसीलिए पूछा।
मैं- ठीक है अगर देखते है तो देखने दे, वैसे भी एक सीधी सी छोटी कॉलोनी में अगर फिरंगी पोशाक पहनेगा तो लोग तो देखेंगे ही।
वो- क्या सच में ये ज्यादा फिरंगी लग रही है, क्या ये मुझपर जँच नहीं रही है। घर जाकर बदल लूँ क्या इसे।
मैं- क्या खुद को आईने में देखा था, या बस टेलीविज़न का ही खुमार समझूँ इसे।
वो- (अंदर से पूरा पागल होकर) भाई यार कोई मुझे पसंद कब करेगी, यार सबकुछ तो करता हूँ मैं, क्या कमी है मुझमें, महँगे कपड़े और जूते भी पहनता हूँ ।
मैं: तो आखिर ये सारा पागलपन इसीलिए था।
वो: भाई चल, घर चलते है यहाँ बड़ी शरम आ रही है। सब अजीब तरह से देख रहे है। मुझे कपड़ें बदलने है अपने।
आखिर कब तक दूसरो को पसन्द आने के लिये हम खुद को बदलते रहेंगें। जो चीज़ में हमें आराम महसूस नहीं होता , उसे अपनाना तो मूर्खता है। मानो कोई आपको इस तरह पसन्द कर भी लेता है तो कब तक हम खुद को बदलकर रख पायेंगे और कब तक ज़िन्दा रख पायेंगे इस झूठे वजूद को। एक रोज़ तो हम अपने असली वजूद पर आयेंगे ही और जब उस वजूद पर आते है तो सामने वाला हमसे पूरा खफा हो जाता है,उसे वो किरदार पसन्द नहीं आएगा, और तब हम भी थक चुके होंगे खुद को बदल बदल कर किसी के लिये, तो शायद बेहतर यही है हम खुद को बदलने की कोशिश ना करें वो भी सिर्फ किसी को आकर्षित करने के लिये।
आज का ये लेख इसीलिये लिखा गया है क्योंकि इस प्रकार के किरदार आजकल हमारे इर्दगिर्द बहुत ज्यादा है।
और शायद सबसे ज्यादा नाराज़गी की का कारण प्रेमी प्रेमिकाओं यही होता है।
उम्मीद है आप इस बात से खुद को बचा पायेंगे खोने से।
शुक्रिया...
- अंकित अग्रवाल

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