यथार्थ प्रतिबिम्ब - Reflection of realism - Hindi Poem
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| यथार्थ प्रतिबिम्ब - Reflection of realism - Hindi Poem |
मेरे बैरागी मन में उठती जो उठती हिलोर हैं
वह मेरी कवित्व प्रवृति ,नहीं कुछ और है
ये पक्षी का कलरव, ये सूरज की आभा
मेघो से गिरती तपती भूमि की आशा
कोई उपमा नहीं प्रकृति के चित्रकार का
अनगिनत ऋण है उसके हर उपहार का
कोई आशा निराशा के रंग हजार है
यहाँ उम्मीदों का दामन थामे चलते बाजार हैं
किनारों की आस में चलती कश्ती का रंग हैं
एक डोर के सहारे उड़ान पर निकली हर पतंग है
नश्वर हैं सब कुछ जीना भी एक विलाप हैं
कभी पाने का कभी खोने का हर किसी का यही संताप हैं
पीड़ा है अधरो में आत्मा का संगीत है
द्वेष है मन में पर प्रकट होती प्रीत है
विरक्त है मन यह असत्यता का चोला है
सत्यता की भ्रामकता से जीवन का पथिक डोला है
यथार्थ से परे हम प्रलोभन में उलझे रहते है
जीवन के दर्शन का मर्म नहीं हम सहते है
- श्वेता पांडेय 'सांझ'

अद्भुत।
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