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Hunger of love - प्यार की भूख - hindi poem

Hunger of love - प्यार की भूख - hindi poem
Hunger of Love - Hindi Poem - Kuchlikha.com
प्यार की जो भूख थी,
वो जिस्म से अनजान थी,
राह मैं तकती रही,
वो जिस्म छू के चला गया।

ना बेड़ियां थी पांव में,
ना हाथ मेरे थे बंधे,
मैं रूह जकड़े रह गई,
वो जिस्म छू के चला गया।

अनगिनत सवालो के संग
बीच राह में छोड़ गया,
मेरी तिश्नगी से बेख़बर,
अपनी ही प्यास को बुझा गया।

इंतज़ार को संग लिए,
मैं बीच रस्ते में खड़ी,
वो हवा के झोंके सा,
आया और चला गया।

- शिवानी शाह

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